ज्यादा गर्मी और कम बारिश की वजह बना ‘El Nino Effect’, जानें क्या है जिसकी वजह से झेलनी पड़ रही है गर्मी की मार
बिपरजॉय तूफान के कारण देशभर के मौसम में बदलाव देखने को मिल रहा है। तेज गर्मी और लू से लोग परेशान है। सामान्य से अधिक हो रही इस गर्मी का कारण है अल नीनो इफेक्ट। इसी के कारण भारत में मानूसन बिगड़ गया है और तेज गर्मी से लोगों का जीना मुहाल हो गया है।
अल नीनो इफेक्ट मौसम से जुड़ी एक विशेष घटना होती है, जो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र का तापमान सामान्य से ज्यादा होने पर बनती है। इस इफेक्ट के कारण तापमान में काफी गर्मी होती है। पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में रहने वाला गर्म सतह वाला पानी भूमध्य रेखा के साथ पूर्व की ओर बढ़ने लगता है, जिससे भारत के मौसम पर असर पड़ता है। ऐसी स्थिति में भयानक गर्मी का सामना करना पड़ता है और सूखे के हालात बनने लगते हैं।
बताया जाता है कि अल नीनो हर दे से सात साल में होता है। इस साल का अल नीनो चार साल में पहला होगा। यह तीन साल लंबे ला नीना चरण का अनुसरण करता है, जो मार्च 2023 में समाप्त हुआ है। औसतन, अल नीनो इफेक्ट लगभग 9-12 महीने तक सक्रिय रहता है। हालांकि, कभी-कभी यह 18 महीने तक जारी रहता है। इस साल अल नीनो के कम से कम सर्दियों तक और 2024 के पहले तीन महीनों तक रहने की उम्मीद है। एक अल नीनो फेज के विकास की घोषणा तब करता है, जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के एक निश्चित क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान कम से कम एक महीने के लिए औसत से कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच जाता है। साथ ही इस दौरान वातावरण में परिवर्तन भी होता है।
अल नीनो वातावरण और महासागर के बीच एक कॉम्प्लेक्स इंटरेक्शन के कारण होता है। इस इफेक्ट के प्राइमरी ड्राइवर भूमध्य रेखा के पास स्थिर पूर्वी हवाएं हैं, जो भूमध्य रेखा और ध्रुवों के बीच सोलर सीट में अंतर के कारण होती हैं। आम तौर पर, ये हवाएं पश्चिमी प्रशांत महासागर में गर्म पानी को बनाए रखने में मदद करती हैं। लेकिन अल नीनो के दौरान, ट्रेड विंड्स कमजोर हो जाती हैं या दिशा उलट जाती है, जिससे मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागरों में गर्म पानी का निर्माण होता है। इस गर्म पानी के निर्माण की वजह से दुनिया भर के मौसम के मिजाज पर गहरा असर पड़ता है।
भारत में सामान्य मानसून वर्षा की भविष्यवाणी मौसम विभाग ने की है। इसके साथ ही मानसून (जून से सितंबर) के दौरान अल नीनो के विकसित होने की संभावनाएं भी 90 प्रतिशत बनी हुई है। ऐसे में इस बार सामान्य से कम बारिश होने के कयास लगाए जाने लगे हैं।
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